उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की किशोर न्याय समिति एवं महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त तत्वावधान में हरिद्वार में आयोजित 'राज्य स्तरीय हितधारक परामर्श'। "विधि से संघर्षरत या देखरेख योग्य बच्चा सबसे पहले एक बच्चा है—जो दण्ड नहीं, बल्कि पुनर्वास और समाज में पुनः एकीकरण का अधिकारी है।" #UttarakhandJudiciary #ChildWelfare #JJAct2015 #HaridwarEvents
हरिद्वार में ‘किशोर न्याय अधिनियम 2015’ के एक दशक की समीक्षा पर राज्य स्तरीय परामर्श आयोजित, बाल अधिकार व पुनर्वास पर दिया गया बल
(संवाददाता गौरव व्यास, उत्तर भारती न्यूज़)
हरिद्वार, 20 सितम्बर 2026। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की किशोर न्याय समिति तथा राज्य सरकार के महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आज हरिद्वार के बहादराबाद स्थित हयात प्लेस में एक दिवसीय राज्य स्तरीय हितधारक परामर्श कार्यक्रम का गरिमामय आयोजन संपन्न हुआ। “किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 : क्रियान्वयन के एक दशक की समीक्षा एवं भावी दिशा” विषय पर केंद्रित इस सम्मेलन का मार्गदर्शन माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री मनोज कुमार गुप्ता ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य न्यायाधीश एवं मंचस्थ माननीय न्यायाधीशों—न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी, न्यायमूर्ति रवीन्द्र मैठाणी, न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल (अध्यक्ष, किशोर न्याय समिति), न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित, न्यायमूर्ति आलोक महरा, न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय तथा न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह—द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया। इस अवसर पर मातृ आँचल कन्या विद्यालय और राजकीय बाल देखरेख गृह रोशनाबाद की बालिकाओं द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना ने सभी को भावविभोर कर दिया, जिसके उपरांत माननीय न्यायाधीशों की धर्मपत्नीगणों द्वारा इन बच्चों को उपहार भेंट कर सम्मानित किया गया।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री मनोज कुमार गुप्ता ने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि केवल कानून बना देना ही पर्याप्त नहीं होता, जब तक कि उसे धरातल पर प्रभावी रूप से लागू न किया जाए। नोबेल पुरस्कार विजेता गैब्रिएला मिस्ट्राल के प्रसिद्ध कथन का संदर्भ देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों के विकास और उनके अधिकारों को कभी भी स्थगित नहीं किया जा सकता। परामर्श के मुख्य वक्ता एवं किशोर न्याय समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने पिछले दस वर्षों के न्यायिक सफर की समीक्षा करते हुए रेखांकित किया कि विधि से संघर्षरत या संरक्षण की आवश्यकता वाला बच्चा सबसे पहले एक बच्चा है, जो दंड के बजाय पुनर्वास और अलगाव के स्थान पर समाज में पुनः एकीकरण का हकदार है। वहीं, न्यायमूर्ति आलोक महरा ने समयबद्ध व बाल-केंद्रित न्याय प्रणाली पर जोर देते हुए कहा कि न्याय में विलंब बच्चे के भविष्य को अंधकारमय बना सकता है, जबकि न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय ने स्वागत भाषण के दौरान राज्य के दुर्गम क्षेत्रों तक प्रत्येक बालक को गरिमा एवं न्याय सुनिश्चित करने हेतु अंतर-विभागीय समन्वय को आवश्यक बताया।
इस राज्य स्तरीय परामर्श में न्यायपालिका, पुलिस, प्रशासन एवं बाल संरक्षण से जुड़े लगभग 180 से अधिक प्रमुख प्रतिनिधियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इनमें उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल श्री योगेश कुमार गुप्ता, निदेशक उजाला, विधि सचिव, महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास सचिव, राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष, सभी जनपदों के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, पॉक्सो व एफटीएससी कोर्ट के जज, जेजेबी के प्रधान मजिस्ट्रेट तथा पुलिस, शिक्षा, स्वास्थ्य व पंचायती राज विभाग के वरिष्ठ अधिकारी शामिल रहे। उद्घाटन सत्र के समापन पर रजिस्ट्रार जनरल श्री योगेश कुमार गुप्ता ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए समाज के प्रत्येक बच्चे के लिए एक सुरक्षित, संवेदनशील और पोषणकारी वातावरण तैयार करने हेतु सभी हितधारकों से एकजुट होकर प्रयास करने की अपील की।
दिनभर चले इस विस्तृत परामर्श कार्यक्रम को पाँच अलग-अलग तकनीकी सत्रों में विभाजित किया गया था, जिनमें दत्तक ग्रहण प्रक्रिया, देखरेख योग्य बच्चे, विधि से संघर्षरत किशोर, प्रारंभिक मूल्यांकन एवं 2015 अधिनियम के व्यापक अवलोकन जैसे ज्वलंत विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। इन सत्रों में निदेशक उजाला श्री प्रदीप पंत, सचिव महिला कल्याण श्री चंद्रेश यादव, सीइओ कारा (भारत सरकार) सुश्री भावना सक्सेना, आईजी कुमाऊं सुश्री निवेदिता कुकरेती, एडवोकेट विक्रम श्रीवास्तव सहित अनेक विषय विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम के सुचारू संचालन एवं अभूतपूर्व सफलता में जिला न्यायाधीश हरिद्वार श्री नरेन्द्र दत्त, उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार/सचिव किशोर न्याय समिति श्री विक्रम तथा जिलाधिकारी श्री मयूर दीक्षित के नेतृत्व में स्थानीय न्यायपालिका व जिला प्रशासन की भूमिका अत्यंत सराहनीय रही।

“विधि से संघर्षरत या देखरेख योग्य बच्चा सबसे पहले एक बच्चा है—जो दण्ड नहीं, बल्कि पुनर्वास और समाज में पुनः एकीकरण का अधिकारी है।”
#UttarakhandJudiciary #ChildWelfare #JJAct2015 #HaridwarEvents









